Sukh Shital Karu Sansar
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E Maya Chhe Ati Balvanti

 

ए माया छे अति बलवंती
पूज्य पाद् जगद्गुरु आचार्य श्री १०८ कृष्णमणिजी महाराज
माया शब्दके श्रवण मात्रसे भी हम मिथ्या, भ्रान्ति, छल, कपट आदिकी कल्पना करने लग जाते हैं । इसकी परिभाषामें कहा गया है कि यह असत्य अर्थको प्रकाशित करती है । यथा, असदर्थप्रकाशिनी माया । माया शब्दमें मा और या दो अक्षर हैं । संस्कृत भाषामें 'मा' का अर्थ होता है नहीं और 'या' का अर्थ होता है जो । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो यथार्थमें नहीं है मात्र दिखती है वह माया है । अथवा जिसका जैसा स्वरूप है उसको उसी रूपमें प्रकाशित न कर दूसरे (ठीक विपरीत) रूपमें प्रकाशित करनेवाली शक्ति माया है । माया स्वयं मिथ्या है और मिथ्याको ही प्रकाशित कर सकती है । किन्तु अज्ञान (माया) के कारण लोग मिथ्याको ही सत्यके रूपमें समझने लगते हैं ।
मायाको अज्ञान भी कहा है । इसी अज्ञानके कारण झूठको सत्य और सत्यको झूठ माना जाता है । महामति श्री प्राणनाथजीने मायाको नींद भी कहा है और इसके अनेक नाम दिए है,
मोह अज्ञान भरमना, करम काल और सुंन ।.
ए नाम सारे नींद के, निराकार निरगुन ।।
(कलश हिन्दी २४/१९)
अर्थात् मोह, अज्ञान, भ्रम, कर्म, काल, शून्य, निराकार, निर्गुण आदि सभी नाम नींदके हैं । मूलतः यह माया ही है । मायाके कारण मोह होता है । मोहके कारण ज्ञान ढक जाता है और अज्ञानकी वृद्धि होती है । अज्ञानके बढ़नेसे भ्रान्ति उत्पन्न होती है जिससे निम्न कोटिके कर्म होने लगते हैं । ऐसे कर्म कालक्रममें शून्यमें विलीन हो जाता हैं । शून्य, निराकार, निर्गुण, निरञ्जनका अस्तित्त्व भी मायाके कारण ही है । यथार्थतः महाप्रलयमें जिनका नाश हो जाता है उन सभीका अस्तित्त्व मायाके कारण है । इसको आदि और अनादि भी कहा है । यथा,
 
ए माया आद अनाद की, चली जात अन्धेर ।
 
मायाको आदि कहनेका कारण यह है कि यह सृष्टिके आदिमें पैदा हुई है । यथा,
 
उपज्यो मोह सुरत संचरी, खेल हुआ माया विस्तरी ।
इत अक्षरको विलस्यो मन, पांच तत्त्व चौदै भुवन ।।
 
अक्षरातीत पूर्णब्रह्म परमात्मा श्री राजजीकी आज्ञासे सर्वप्रथम अक्षर ब्रह्मके द्वारा मोह तत्त्व उत्पन्न हुआ । उसीमें अक्षरके मनने प्रवेश किया जिससे पाँच तत्त्व और तीन गुण प्रकट हुए । जिनके मिश्रणसे यह सम्पूर्ण सृष्टि बनी हुई है । जैसे ही अक्षर ब्रह्म अपने मन की वृत्तियोंका संवरण करते हैं उसी समय यह चराचर सृष्टि मिट जाती है । इसको महाप्रलय अथवा आत्यन्तिक प्रलय कहते हैं । यद्यपि प्रलय भिन्न-भिन्न हैं (यथा, नित्य, नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक ) और वे निश्चित समयमें अपना प्रभाव दिखाते हैं, तथापि महाप्रलयमें उक्त सभी प्रलय समा जाते हैं । महाप्रलय या आत्यन्तिक प्रलय परिवर्तनशील जगतका अन्तिम परिवर्तन है । मुख्यतः यह अक्षर ब्रह्मकी मनोवृत्तिका संवरण है ।
मायाको अनादि इसलिए कहा गया है कि यह मूलतः अक्षरातीत पूर्णब्रह्म परमात्माकी आज्ञासे उत्पन्न होती है और इसका बीज अक्षरब्रह्मके मनमें विद्यमान है । ब्रह्मांडोंको बनाना, थोड़े समयके लिए टिकाना और मिटाना यह अक्षर ब्रह्मका नित्य कार्य है । जिस प्रकार बालक स्वभावतः कुछ वस्तुओंको एकत्र कर कुछ बनाता है और दूसरे ही क्षण उसे मिटाता भी है । ब्रह्माण्डोंको बनाने और मिटानेके कारण अक्षर ब्रह्मको बाल स्वभाव अथवा बाल चरित्र कहा गया है । यथा,
 
श्री भगवानजी खेलत बाल चरित्र, आप अपनी ईच्छासों प्रकृत ।
 
अक्षरब्रह्मकी ईच्छाको मूल प्रकृति कहा गया है । इसीसे यह दृश्यमान जगत अस्तित्वमें है । किन्तु अक्षर ब्रह्म भी अक्षरातीतकी आज्ञासे ही ब्रह्माण्डोंको बनाते हैं और मिटाते हैं । इसलिए माया अक्षरातीतकी आज्ञासे ही उत्पन्न होती है । इसकी शक्ति अपार है । तभी महामतिने कहा है,
 
ए माया छे अति बलवंती, उपनी छे मूल धनी थकी ।
मुनि जनने मनाव्या हार, शिव ब्रह्मादिक न लहे पार ।।
                                                                (रास १/४)
अक्षरातीतकी आज्ञासे उत्पन्न होनेके कारण यह शक्तिशालिनी है और संसारके जीव इसका पार नहीं पा सकते हैं । सामान्य व्यक्तियोंकी बात ही क्या करें ऋषि-महर्षि भी इसके प्रभावसे नहीं बच सके । इतना ही नहीं पातालसे लेकर सतलोक पर्यन्त एवं देवी देवताओंसे लेकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित भगवान नारायण पर्यन्त सभी मायासे प्रभावित हैं । संक्षेपमें कहें तो माया यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही नहीं ऐसे अनन्त ब्रह्माण्ड एवं उनके स्वामी भगवान नारायणको भी नहीं छोड़ रही है । अक्षरब्रह्म द्वारा रचित सम्पूर्ण सृष्टि माया द्वारा प्रभावित है । इसका कारण यह है कि यह सम्पूर्ण सृष्टि माया द्वारा ही बनी है और मायाका ही विस्तार है ।
ऐसी शक्तिशालिनी मायामें ब्रह्मात्माओंका आगमन हुआ है इसलिए वे भी इसके प्रभावसे अछूते नहीं हैं । इसलिए ब्रह्मात्माएँ भी स्वयंको, अपने धनीको और अपने धामको भी भूल कर मायामें लिप्त बनी हुई हैं । उनको जागृत करनेके लिए श्री राजजीने श्री श्यामाजीको सद्गुरु श्री देवचन्द्रजीके रूपमें भेजा । उन्होंने मायामें रहते हुए भी अपने धनीकी खोज कर ब्रह्मात्माओंको मायासे पार होनेका मार्ग दिखाया । श्री राजजीने स्वयं प्रकट होकर ब्रह्मज्ञान-तारतम ज्ञान प्रदान किया और स्वयं श्री देवचन्द्रजीके हृदय धाममें विराजमान हुए । श्री देवचन्द्रजी महाराजने तारतम ज्ञानके द्वारा ब्रह्मात्माओंकी जागनीका कार्य किया । जो ब्रह्मात्माएँ सद्गुरुकी शरणमें आइंर् और उन्होंने तारतम ज्ञानको हृदयंगम किया वे मायाके प्रभावसे बच सकी । इसीलिए महामति कहते हैं,
 
हवे मायानो जे पामसे पार, तारतम करसे तेह विचार ।
ब्रह्माण्ड माहें तारतम सार, एणे टाल्यो सहुनो अंधकार ।।
                                                                 (रास १/४१)
सद्गुरुकी शरणमें आकर तारतम ज्ञानको हृदयंगम करनेवाली आत्माएँ मायाका पार पा सकती हैं । इस ब्रह्माण्डमें तारतम ज्ञान ही सम्पूर्ण शास्त्रोंका सार है और अज्ञानरूपी अन्धकारको मिटानेमें सक्षम है ।
मायासे पार होनेके लिए अथवा मायाके प्रभावसे मुक्त होनेके लिए सद्गुरुकी शरणमें आना अतीव आवश्यक है । महामतिने अनेक चौपाइयोंके द्वारा यह बात स्पष्ट की है । वे स्वयंके लिए कहते हैं, जब तक मैंने सद्गुरुके वचनोंका पालन नहीं किया, उनकी आज्ञाको शिरोधार्य नहीं माना एवं सद्गुरुको अपने हृदयमें नहीं बैठाया तब तक माया मुझे पराजित करती रही । सद्गुरुको हृदयमें धारण कर उनके वचनोंका पालन करते ही मायाका प्रभाव शान्त होने लगा । यथा,
 
तमे अनेक सिखामण कही, पण भरम आडेमें कांई नव ग्रही ।
मोसूं एवी तोहज थई, जो वाणी तमारीमें नव लही ।।
तमे पेरे पेरे समझावी, मुने तोहे बुध न आवी ।
जुगतें करीने जगावी, लई तारतमें लगावी ।।
तमें अंतरगतें दीधां दृष्टान्त, त्यारे भागी मारा मननी भ्रांत ।
हवे तमें आव्या एकान्त, संसार दसा थई स्वांत ।।
                                                                    (रास १/१४,१६)
जब सद्गुरुके रूपमें पधारे हुए धामधनीकी शरण प्राप्त होती है तब शत्रुओंका बल स्वतः क्षीण होने लगता है और बिगडा हुआ कार्य भी सुधर जाता है । इस प्रकार सद्गुरुकी शरण मनके मनोरथ पूर्ण कर देती है । यथा,
 
ज्यारे धणी धणवट करे, त्यारे बल वैरीना हरे ।
वली गयां काम सराडे चढे, मन चितव्यां कारज सरे ।।
                                                              (रास १/१७)
इस सन्दर्भमें और कहते हैं,
 
तमे कृपा कीधी अति घणी, जाणी मूल सगाई घर तणी ।
माया पाडी पडताले हणी, बल दीधु मुने मारे धणी ।।
 
हे सद्गुरु धनी ! आपने परमधामका सम्बन्ध जानकर अपार कृपा की है । आपने ही मुझे ऐसी शक्ति दी कि जिससे मैंने मायाको ठोकर लगा कर मार गिराया ।
सद्गुरु अपने शिष्यको अपनत्व प्रदान करते हैं । उनको आत्माकी पहचान होती है और वे आत्माके शाश्वत सम्बन्धका पालन करते हैं । निजानन्दाचार्य श्री देवचन्द्रजी महाराजने महामतिको अपनी अंगना जानकर सर्वतोभावेन उनकी रक्षा की । जब जब भी महामतिको सद्गुरुके अन्दर श्री राजजीके दर्शन हुए हैं तब तब उन्हें मायाका प्रभाव न रहा हो ऐसा अनुभव हुआ है । जैसे ही सद्गुरु महामतिके हृदयधाममें विराजमान हुए तभीसे उनको व्रज रास एवं परमधामके दृश्य दृष्टिगोचर होने लगे । सद्गुरु तो पहलेसे ही महामतिके हृदयमें विराजमान हो गए थे किन्तु जबसे उनको इसका अनुभव होने लगा तभीसे मायाका प्रभाव दूर होने लगा इसका तात्पर्य यह है कि जब हम सद्गुरुकी शरणका अनुभव करने लगेंगे तभीसे मायाका प्रभाव दूर होने लगेगा । अन्यथा माया इतनी प्रबल है कि वह प्रभावित किए बिना नहीं रह सकती ।
दूसरी ओरसे देखें तो यह ज्ञात होगा कि ब्रह्मात्माएँ पूर्णब्रह्म परमात्मा श्री राजजीके चरणोंमें बैठ कर मायाका खेल देख रही हैं । श्री राजजीके चरणोंमें रहते हुए उनपर मायाका प्रभाव कैसा ? यह जिज्ञासा उत्पन्न हो सकती है । इसलिए हमें यह जानना आवश्यक है कि श्री राजजीके चरणोंमें रहते हुए भी उनकी सुरता तो मायामें लगी है । जब तक यह सुरता मायामें लगी रहेगी तब तक मायाका प्रभाव उन पर पड़ता रहेगा । जैसे ही सद्गुरु प्रदत्त तारतम ज्ञानके द्वारा यह ज्ञात होगा कि हम तो मूल रूपसे श्री राजजीके चरणोंमें ही हैं और हम ऐसा अनुभव भी करने लगेंगे कि हम वास्तवमें श्री राजजीके सान्निध्यमें ही हैं तभी मायाका प्रभाव दूर होगा । अन्यथा जानने मात्रसे यह प्रभाव दूर नहीं होगा । इसीलिए तारतम ज्ञानके द्वारा यह रहस्य समझाया है और हमें अपनी, अपने धनी और अपने धामकी पहचान करवायी है किन्तु अनुभव तो हमें प्रेमलक्षणा भक्तिसे ही होगा । इसलिए तारतम ज्ञानके साथ साथ प्रेमलक्षणा भक्तिकी आवश्यकता होगी । अन्यथा मायाके प्रभावसे मुक्त होनेमें लम्बा समय लगेगा । हमें अपनी सुरताको मायासे हटाकार श्री राजजीके चरणोंमें लगाना है,
 
 इन उलटीसे उलटाए के पिया प्रेमें करूं सनमुख ।
 
किन्तु यह कार्य मात्र ज्ञानसे नहीं अपितु प्रेमसे सम्भव नहीं होगा । क्योंकि ज्ञानमें अहंभावके लिए पूर्णसम्भावना रहती है । हम ज्ञानसे दुनियामें बड़े बनना चाहते हैं जबकि प्रेम समर्पण सिखाता है । प्रेममें हम स्वयंको मिटा देते हैं । इसीलिए कहा है,
 
पंथ होवे कोटि कलप, प्रेम पहुंचावे मिने पलक ।
 
प्रेमके अतिरिक्त अन्य सभी साधनायें परमात्मा पर्यन्त पहुँचानेमें लम्बा समय लगाती हैं । और मार्गमें भी अनेक विघ्नवाधायें आनेसे पहुँचना निश्चित नहीं होता हैं । ऐसेमें प्रेमका मार्ग अति उत्तम होता है और वह पलमात्रमें पहुँचा देता है । प्रेम मार्गकी दूसरी विशेषता यह है कि उसमें किसी प्रकारकी रुकावट नहीं रहती है । वह सारे द्वारोंको खोल देता है,
 
प्रेम खोल देवे सब द्वार, पारके पार पियाके पार ।।
 
प्रेम मार्गकी तीसरी विशेषता यह है कि यह अन्तर्यात्रा है । इसके लिए बाह्य यात्राकी कोई आवश्यकता नहीं रहती है । यह तो प्रेमीको वहीं बैंठे बैंठे उसी शरीरमें रहते हुए भी पारका अनुभव करवा देता है । मायामें रहते हुए भी श्री राजजीके सान्निध्यका अनुभव करवा देता है । यथा,
 
प्रेम ऐसी भांत सुधारे, ठौर बैठे पार उतारे ।।
 
और भी, इतहीं बैठे घर जागे धाम, पूरण मनोरथ हुए सब काम ।।
इस प्रकार प्रेममार्गकी अनेक विशेषतायें हैं । यहाँ पर मात्र संकेत ही किया है । शास्त्रोंने इस मार्गको गुप्त रखा था । ब्रह्मात्माओंके आगमनसे यह प्रकट हुआ है । यथार्थमें ब्रह्मात्माएँ ही प्रेमके साथ प्रकट हुई हैं । उनके आगमन पूर्व संसारमें प्रेमका नाम ही था । उसका स्वरूप तो ब्रह्मात्माओंने ही प्रकट किया है । नारदजीने भी प्रेमके लिए यथा व्रज गोपिकानामके द्वारा गोपियोंका उदाहरण देकर इस बातकी पुष्टि की है ।
सामान्यजन शरीर या संसारके प्रति होनेवाले आकर्षणको प्रेम समझते हैं । यह प्रेम नहीं अपितु मोह है । इसमें पड़ने पर मनुष्यका पतन होता है । जबकि प्रेम परमात्माके प्रति होनेवाला आकर्षण है । वह आत्माका धर्म है । ऐसे प्रेममें डूबनेवाला व्यक्ति भी भव सागरसे पार हो जाता है । उसका पतन कभी भी सम्भव नहीं है । उसका तो सदैव उत्थान ही है । वह तो यहाँ बैठे बैठे पार पहुँच जाता है । ऐसा प्रेम मूलतः ब्रह्मात्माओंमें ही है । उनके सम्पर्कमें आनेवाले अन्य जीव भी इसका आस्वादन कर पाते हैं । इसके लिए अन्तःकरणकी शुद्धता अर्थात् हृदयकी निर्मलता परम आवश्यक है । प्रेममें कभी भी प्रदर्शन (दिखावा) नहीं होता है । प्रेममें क्षणमें हसना क्षणमें रोना या पागल पन होना भी भूषण है दूषण नहीं । प्रेमके दिखावा करना दूषण कहलाता है । यह दुनियाँ दिखावेकी है । इसलिए इसमें लगोंको दिखावा अच्छा लगता है और समझते भी उसीको हैं । इसमें प्रेमको समझने वाला विरला ही होता है । इसलिए सामान्य जन दिखावेको प्रेम समझते हैं और प्रेमको दिखावा समझते हैं । इसका कारण यह है कि जिसके हृदयमें प्रेम ही प्रकट नहीं हुआ है वह दूसरेके प्रेमको कैसे समझ पाएगा ? जिसके हृदयमें छल, कपट, राग, द्वेष आदि भरे हुए हैं ऐसे लोग इन्हीं भावोंको समझ पाते हैं । वे प्रेमको समझ नहीं पायेंगे । इसलिए उनको तो प्रेमी पागल लगने लगेगा और वे उसकी मजाक करने लगेंगे । प्रेमी तो हृदयसे पागल होगा और वह भी परमात्माके प्रेममें, जबकि दुनियाँका पागल बुद्धिसे पागल होगा और दुनियाँके पीछे पागल होगा । दुनियाँकी चतुराईसे तो परमात्माके प्रेममें पागल होना ही श्रेष्ठ है । संसारके चतुर व्यक्तियोंसे तो परमात्माके प्रेममें पागल व्यक्ति करोड़ों गुना श्रेष्ठ होता है । किन्तु यह पागलपन मायाके विकारोंसे मुक्त होने पर ही प्रकट होता है । इसलिए इन विकारोंसे मुक्त होना अति आवश्यक है । अध्यात्म क्षेत्रकी सभी साधनायें विकारोंसे मुक्त होनेके लिए हैं । परमात्माको पानेके लिए तो मात्र प्रेम ही एक साधन है । किन्तु विकारोंके होते हुए परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती है इसलिए विकारोंको दूर करनेवाली साधनाओंको भी परमात्माकी प्राप्तिके लिए कहा जाता है । यथार्थतः परमात्मा प्रेमसे ही प्राप्त होतंे है । इस रहस्यको समझनेके लिए भी ज्ञानकी आवश्यकता होती है अन्यथा साधक भ्रान्तिमें पड़कर पथभ्रष्ट हो जाएगा । इसीलिए महामति श्री प्राणनाथजीने तारतम्य ज्ञान एवं प्रेमलक्षणा भक्तिका एकसाथ उपदेश दिया है । क्योंकि ज्ञानसे जाना जाता है और प्रेमसे पाया जाता है ।
मायाके प्रवाहमें बह कर मोहको ही प्रेमका वाघा पहनाने वाले प्रेमके नाम पर भ्रान्तियाँ फैलाते हैं और कहते हैं कि यह माया भी तो मूलतः श्री राजजीसे ही प्रकट हुई है, इसलिए इसका पार पाना सम्भव नहीं है । ऐसे व्यक्ति स्वयं भी मोहपासमें बंधे हुए होते हैं और दूसरोंको भी इसीमें जकड़े रखना चाहते हैं । अपनी कमीको छिपानेका यह बहुत बड़ा बाहना है । वास्तवमें हम अपने कर्मोंके कारण माया मोहके पाशमें बँधे हुए होते हैं । यद्यपि यह माया श्री राजजीसे ही उत्पन्न हुई है किन्तु श्री राजजीने इसको देखनेके लिए कहा है, भोगनेके लिए नहीं । हम इसके लुभावने आकर्षणोंकी ओर खींचे जाते हैं जिससे यह हमें अपने पाशोंमें जकड़ लेती है । यह अपने हथियारोंसे सज कर बैठी है । इसका काम ही यही है । महामतिने मायाके हथियार गिनाए हैं,
 
एहना आउध अमृत रूप रस, छल बल वल अकल ।
अगिन कुटिल ने कोमल, चंचल चतुर चपल ।।
 
अर्थात् अमृत (भौतिक वस्तुओंका प्रलोभन), रूप (सौन्दर्य), रस (मधुर वाणी), छल, बल (शक्ति), वल (दाउ पेच), बुद्धि चातुर्य अग्नि (काम क्रोधरूपी आग), कुटिलता (कटप), कोमलता (विनम्रता), चंचलता, चतुरता और चपलता ये तेरह हथियार मायाके हैं । यह शाम, दाम, दण्ड भेद जैसे सभी उपायोंसे अपने वशमे करनेके लिए सदैव तैयार रहती है । इसलिए जो आत्माएँ अपने धनीको भूलकर मायाकी ओर देखती हैं उनको यह शीघ्र ही अपने पाशमें जकड़ लेती हैं किन्तु जो आत्माएँ अपने धनीसे प्रेम करती हुई, उनके सान्निध्यका अनुभव करती हुई मायाको देखती हैं उनको यह प्रभावित नहीं कर पाती है । जो आत्माएँ मायाकी ओर आकृष्ट हो जाती हैं, उनकी भावना एवं कर्म दोनों ही दूषित हो जाते हैं जिससे वे बन्धनमें फँस जाते हैं । इसलिए हमें अच्छे कर्म करते हुए निरन्तर श्री राजश्यामाजीका स्मरण करना चाहिए । अन्यथा एक दुष्कर्म अनेकों बुराइयोंको निमन्त्रण देता है और हम लापरवाही करते हुए उनमें फँसते जायेंगे ।
जीवनमें सद्गुरुका मार्गदर्शन और श्री राजजीकी भक्ति प्राप्त होगी और हम सच्चे दिलसे श्री राजजीसे प्रेम करेंगे तो हमारा जीवन सफल होगा और हम मायाके बन्धनोंमें फँसे बिना निरन्तर आनन्दका अनुभव कर पायेंगे । अस्तु ।
 

 

 

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