Sukh Shital Karu Sansar
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Shri Krishna Pranami Dharma

 

श्रीकृष्ण प्रणामी धर्म
जगद्गुरु आचार्य श्री १०८ कृष्णमणिजी महाराज
धर्मप्राण सुन्दरसाथजी ! हम जिस पृथ्वीमें रह रहे हैं उसे शास्त्रोमें पृथ्वीलोक, भूलोक, मृत्युलोक आदि नाम दिये हैं । प्रत्येक नामकी अपनी अपनी विशेषतायें हैं । यह मृत्युलोक ब्रह्माण्डके अन्तर्गत विद्यमान चौदह लोकोंमेंसे एक है । इन चौदह लोकोंमें इस मृत्युलोकसे निम्नकक्षाके सात लोक हैं जिनको सात पाताल कहा गया है और इससे उच्चकक्षाके अन्य छः लोक हैं जिनको स्वर्ग आदि लोक कहते हैं । उक्त छः लोकोंमें भौतिक सुखोंसे सम्पन्न लोकके रूपमें स्वर्ग लोक प्रसिद्ध है । इसलिए पृथ्वीमें भी सुख सुविधा सम्पन्न स्थान हो तो उसे पृथ्वीका स्वर्ग कहते हैं । स्वर्गसे भी श्रेष्ठ सुख वैकुण्ठके कहलाते हैं । जो जीव वैकुण्ठ लोकको प्राप्त करते हैं वे वहाँपर अनेक वर्ष पर्यन्त रहकर अनेक प्रकारके सुख प्राप्त करते हैं । नैमित्तिक प्रलयमें स्वर्ग पर्यन्तके दस लोक नाश होते हैं । उस समय भी वैकुण्ठ लोक यथावत रहता है । इसलिए वैकुण्ठको मुक्तिका स्थान भी माना जाता है । वास्तवमें वैकुण्ठकी मुक्ति अस्थायी कहलती है क्योंकि प्राकृतिक प्रलयमें यह सम्पूर्ण प्राकृत जगत लय हो जाता है उस समय ये चौदह लोक सभी लयको प्राप्त होते हैं । सामान्य लोगोंको इतनी लम्बी अवधिका ख्याल नहीं होता है इसलिए वे वैकुण्ठको मुक्ति स्थल मानते हैं । यथार्थतः चौदहलोक युक्त यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही महाप्रलयमें लयको प्राप्त होता है उस समय चौदह लोक, उनको आवृत्त किए हुए आठ प्रकारके आवरण, ज्योति स्वरूप, गायत्री सहित शून्य, निराकार, निरञ्जन, महाशून्य आदि किसीभी स्थानका अस्तित्त्व नहीं रहता है । यहाँ तक कि स्वयं भगवान नारायण भी अपने मूल स्वरूप अव्याकृत अक्षरमें समा जाते हैं । इस प्रकार समय आनेपर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही नाश हो जाता है । इसलिए इस ब्रह्माण्डको नाशवान्, क्षणभङ्गुर, क्षर कहा गया है । जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही क्षर कहलाता है तो इसके अन्तर्गत आनेवाले सभी देव भी क्षर कहलाते हैं । इस प्रकार ब्रह्माण्डके अधिष्ठाता कहलानेवाले भगवान नारायण भी परिवर्तनशील होनेसे क्षर ब्रह्म कहलाते हैं । अभी तक एक ब्रह्माण्डकी चर्चा की गई है । ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड शून्यमण्डलमें फिरते रहते हैं । इन सभी ब्रह्माण्डोंको क्षर ब्रह्माण्ड एवं उनके अधिष्ठाता भगवान नारायणको क्षर ब्रह्म कहा जाता है । जिस प्रकार क्षर ब्रह्माण्ड असंख्य हैं उसी प्रकार क्षर ब्रह्म भी असंख्य हैं । क्षरका अर्थ क्षरणशील अर्थात् परिवर्तनशील या नाशवान होता है । प्रत्येक ब्रह्माण्डमें भगवान नारायण, ब्रह्मा-विष्णु-महेश एवं तैतीसकोटि देवी-देवतायें होते हैं । इन सभीको क्षर कहा गया है । ये सभी क्षरब्रह्मके अन्तर्गत आते हैं ।
इन असंख्य क्षरब्रह्माण्डको बनानेवाले कार्यब्रह्म अथवा अक्षरब्रह्म कहलाते हैं । वे अविनाशी हैं, अपरिवर्तनशील हैं और सभी क्षरब्रह्माण्डोंके मूलमें स्थित होनेसे कूटस्थ भी कहलाते हैं । अक्षरब्रह्म नेत्रभ्रमण मात्रमें इन असंख्य ब्रह्माण्डोंको बनाते हैं, टिकाते हैं और लय करते हैं । इस प्रकार ब्रह्माण्ड.ोंकी सृष्टि, स्थिति और लयका कार्य करनेके कारण अक्षरब्रह्मको कार्यब्रह्म भी कहा जाता है । उनका बहुत बडा ऐश्वर्य है । उनके विभिन्न विभूति स्वरूप हैं । उनको अव्याकृत, सबलिक, केवल एवं सत्स्वरूप कहा गया है । प्रणव ब्रह्म, गोलोकी नाथ आदि अनेक विभूतियाँ अक्षरब्रह्मके उक्त चार पादोंमें समाहित हैं । अक्षरब्रह्मको चतुष्पाद विभूति भी कहा गया है । सभी विभूतियाँ अक्षरब्रह्मके ही अंग हैं इसलिए मूलरूपसे अक्षरब्रह्म ही कहलाते हैं ।
ऐसे महान अक्षरब्रह्म भी पूर्णब्रह्म परमात्माके अंगस्वरूप या अंशमात्र हैं एवं पूर्णब्रह्मकी आज्ञाा लेकर ही ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि, स्थिति एवं लय करते हैं तो स्वयं पूर्णब्रह्म परमात्मा कितने महान् होंगे ? इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है । इसलिए पूर्णब्रह्म परमात्माको शब्दातीत कहा है । इसका तात्पर्य है कि हमारी व्यावहारिक भाषाके शब्द परमात्माका वर्णन नहीं कर पाते हैं । इसीलिए शस्त्रोंमें पूर्णब्रह्म परमात्माका वर्णन न कर संक्षेप मात्रमें उल्लेख किया है अर्थात् उनके विषयमें संकेत मात्र किया है । पूर्णब्रह्म परमात्माका धाम परमधाम है । स्वयं पूर्णब्रह्म परमात्मा एवं परमधामके विषयमें प्रायः सभी शास्त्र संकेत मात्र करते हैं ।
अक्षरब्रह्मकी चतुष्पाद विभूतिका वर्णन करते हुए वेदोंमें कहा है,
एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पुरुषः ।
                                         ऋग्वेद १०/९०/३
यह तो अक्षरब्रह्मकी महिमा मात्र गायी है । स्वयं अक्षरब्रह्म इससे अति श्रेष्ठ हैं । जब अक्षरब्रह्मके विषयमें ही शास्त्र मौन धारण करते हों तो परब्रह्मकी स्थिति तो और भी महान् है । इसीलिए शास्त्रोंमें परब्रह्मका उल्लेख मात्र किया है । इससे यह ज्ञाात होना चाहिए कि पूर्णब्रह्म परमात्मा मन एवं वाणीके गोचर नहीं है । इसलिए उनको अवाङ्मनसगोचर कहा गया है ।
मन और वाणीके विषयसे परे होते हुए भी परमात्माको जानना एवं समझना इति आवश्यक है । अन्यथा जन्म और मृत्युके चक्रसे पार नहीं हो सकते हैं । वेदोंमें भी कहा है,
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेयनाय ।।
इन परमात्माको जानकर ही मृत्युको पार किया जा सकता है अन्यथा जन्ममृत्युके चक्रसे पार होनेका कोई अन्य मार्ग नहीं है ।
विदित हो कि इन्हीं परमात्माको जानने, समझने एवं अनुभव करनेके लिए मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है । जगतमें प्रसिद्ध चौरासी लाख योनियोंके द्वारा संसारके सुख एवं वैभव भोगे जा सकते हैं । किन्तु पूर्णब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति तो मनुष्य जीवनके द्वारा ही संभव है । महामति श्री प्राणनाथजी कहते हैं,
सेठें तमने सारी सनंधे, सौंप्यु छे धन सार ।.
अनेक जवेर जतन करी, तमे लाव्या छो आणी वार ।।
सेठोंके भी सेठ पूर्णब्रह्म परमात्माने मनुष्य देहके साथ तुम्हें असंख्य सम्पदा प्रदान की है । उनका सदुपयोग करो और इसी जीवनमें परमात्माका अनुभव करो । साथमें यह भी ज्ञाातव्य है कि मनुष्य शरीरके अतिरिक्त सभी शरीर भोग योनियाँ माने गए हैं । उनके द्वारा नश्वर जगतके विभिन्न प्रकारके सुख भोगे जा सकते हैं । जबकि मानव शरीरके द्वारा भौतिक सुख भी भोगे जा सकते हैं और परमात्माकी प्राप्ति भी की जा सकती है । किन्तु मनुष्य शरीर प्राप्त करनेके पश्चात् भी मात्र भौतिक सुख ही भोगे गए और जन्ममृत्युके चक्रसे छूटकर परमात्माके धाममें पहुँचनेका मार्ग प्राप्त नहीं किया तो उस मनुष्यको श्रीमद्भागवतमें आत्मघाती कहा है । यथा,
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदूर्लभं, प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् ।.
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं, पुमान्भवाब्धिं न तरेत्स आत्महा ।।
                                                                          -श्रीद्बागवत....
परमात्माकी प्राप्तिके लिए मुख्यतया दो मार्ग बताये गए हैं । उनको ज्ञाान और भक्ति कहा है । ज्ञाानके द्वारा परमात्माको जाना जा है जिससे शरीर छोड.नेके पश्चात् आत्मा परमधाममें पहुँचती है । भक्तिके द्वारा परमात्माको इसी जीवनमें अनुभव किया जा सकता है । जिस ज्ञाानके द्वारा पूर्णब्रह्म परमात्माको जाना जा सकता है उसे श्रीकृष्ण प्रणामी धर्ममें तारतम ज्ञाान कहा गया है और जिस भक्तिके द्वारा पूर्णब्रह्म परमात्माका अनुभव किया जा सकता है उसे प्रेमलक्षणा भक्ति कहा गया है ।
अनेक लोग देवी देवताओंको परमात्मा मानते हैं, अनेक लोग अवतारोंको परमात्मा मानते हैं, अनेक लोक ब्रह्मा-विष्णु-महेशको परमात्मा मानते हैं तो अनेक लोग भगवान नारायणको परमात्मा मानते हैं । ये सभी परमात्मा न होकर उनकी शक्तियाँ मात्र हैं । ये शक्तियाँ भी परिवर्तनशील होनेसे उनको परमात्माका क्षर स्वरूप कहा गया है । इन क्षर स्वरूपोंको बनानेवाली परमात्माकी दूसरी शक्ति है । जिसे पमात्माका अक्षर स्वरूप कहा गया है । पूर्णब्रह्म पमात्मा तो क्षर एवं अक्षरसे श्रेष्ठ होनेसे अक्षरातीत कहलाते हैं । किन्तु समान्य मनुष्यको यह रहस्य पता नहीं होता है । इस रहस्यको स्पष्ट करनेवाले ज्ञाानको ही तारतम्य ज्ञाान कहा है । तारतम्य ज्ञाानके द्वारा परमात्माके क्षर, अक्षर एवं अक्षरातीत स्वरूपको जाना जाता है । कहा भी है,
तारतम्येन जानाति सच्चिदानन्दलक्षणम् ।
परमात्माका स्वरूप सच्चिदानन्द है । तारतम्य ज्ञाानके द्वारा इस स्वरूपका बोध होता है । किन्तु आत्मज्ञाान होने पर ही ब्रह्मबोध हो सकता है । इसीलिए महामतिने कहा,
पहेले आप पहेचानो से साधो, पहले आप पहचानो । .
बिना आप चिन्हें पारब्रह्म को, कौन कहे मैं जानो ।।
                                                     (किरन्तन १/१)
हे साधको ! सर्वप्रथम स्वयंको आत्माके रूपमें पहचानो । जब तक हम स्वयंको आत्माके रूपमें नहीं पहचानेंगे तबतक हमें पात्मात्माका ज्ञाान नहीं होगा । इसप्रकार तारतम्य ज्ञाान आत्माका भी ज्ञाान करवाता है और परमात्माका भी । इसलिए तारतम्य ज्ञाान आत्मज्ञाान भी है और ब्रह्मज्ञाान भी है । यह ज्ञाान रहस्यपूर्ण है । इसके रहस्यको समझनेके लिए परिष्कृत बुद्धिकी आवश्यकता होती है । सामान्यतया बुद्धि तीन प्रकारकी मानी गई है । स्मृति, मति और प्रज्ञाा । उत्कृष्ट बुद्धिको प्रज्ञाा कहा गया है ।
जो लोग देहको ही आत्मा मानते हैं उनकी बुद्धि देहात्मबुद्धि कहलाती है । ऐसी बुद्धि सत्यको ग्रहण नहीं सकर सकती है । सत्य परमात्मा हैं । उनके अंश होनेके कारण आत्मा भी सत्य है । इस प्रकार सत्यको धारण करनेवाली बुद्धिको शास्त्रोंमें ऋतम्भरा प्रज्ञाा कहा है । वास्तवमें ऋतम्भरा प्रज्ञाा तारतम्य ज्ञाानको धारण कर सकती है । जिसके द्वारा आत्मा और परमात्माका ज्ञाान सहज प्राप्त होता है । हमारी बुद्धि ऋतम्भरा प्रज्ञाा बने इसके लिए हमें प्रयत्न करना चाहिए । मन एवं बुद्धिको अन्तर्मुख बनाने पर ही यह संभव है । जब बुद्धि मनके साथमें इन्द्रियोंके विषयोंकी ओर जाती है तब वह असत्य वस्तुओंको धारण करती है और विकृत हो जाती है । जब वह आत्माकी ओर उन्मुख होती है और आत्माकी सत्यताको धारण करने लगती है तब वह शनैः शनैः ऋतम्भरा प्रज्ञाा बन जाती है । इसके लिए हमें सदैव आत्माका चिन्तन करना चाहिए और सत्यका अनुसरण करना चाहिए । जब हमारे मन और बुद्धिको सत्यका स्वाद प्राप्त होने लगेगा तब वे सत्यकी ओर आकृष्ट होंगे और परिपुष्ट होने लगेंगे । इस प्रकार मन एवं बुद्धि दोनों ही परिष्कृत होने लगेंगे । परिष्कृत होने पर उनकी स्थिति ही ऋतम्भरा प्रज्ञाा है । इसी स्थितिमें बुद्धि आत्मा और परमात्माका ज्ञाान प्राप्त करती है ।
इस प्रकार आत्मज्ञाान प्राप्त करने पर ब्रह्मज्ञाान प्राप्त करनेका मार्ग भी स्पष्ट होने लगेगा । परमात्माकी ओर रुचि बढने पर धीरे धीरे ब्रह्मज्ञाान भी प्राप्त होगा । तब परमात्माका यथार्थ स्वरूप समझमें आयेगा । इतना होने पर अनेक साधकोंको सन्तुष्टि हो जाती है तथापि कुछ साधक इससे आगे बढना चाहते हैं ऐसे साधक जीवनमें परमात्माकी अनुभूति करना चाहते हैं । उनके लिए भी मार्ग प्रशस्त किया गया है । वह है प्रेम मार्ग । प्रेमके द्वारा साधक इसी जीवनमें परमात्माका अनुभव कर सकता है । प्रेम साधनाके सभी रुकावटोंको दूर कर देता है । जब सभी आवरण दूर हो जायेंगे तभी परमात्माकी अनुभूति होगी । इसी जीवनमें परमात्माकी अनुभूति हो सकती है । प्रेममार्ग इसी जीवनमें परमात्माकी अनुभूतिके लिए है । प्रेम सभी द्वारोंको खोल देता है । यथा,
प्रेम खोल देवे सब द्वार, पार के पार पियाके पार ।
साधनाके अन्यमार्गमें विभिन्न अवरोध होनेसे दीर्घकालीन साधनाके पश्चात् ही परमात्माकी अनुभूति संभव है किन्तु प्रेम साधनामें तत्काल उसी क्षण परमात्माकी प्राप्ति संभव है । महामति कहते हैं,
पंथ होवे कोटि कलप, प्रेम पहुँचावे मिने पलक ।
प्रेमके लिए तो यहाँतक कहा है कि प्रेमी साधक इसी शरीरमें रहते हुए परमात्माका प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है । परमात्मा उसके समक्ष प्रकट भी होते हैं और वह ध्यानमें परमात्माके पास भी पहुँच जाता है । इसके लिए महामति कहते हैं,
प्रेम ऐसी भाँत सुधारे, ठौर बैठे पार उतारे ।
व्रजकी गोपियोंकी स्थिति ऐसी थी । जागृत ब्रह्मात्माएँ इसी स्थितिमें होती है । महामति कहते हैं, ऐसी आत्माएँ क्षणमात्रके लिए भी अपने परमात्मासे दूर नहीं होती हैं । यथा,
खाते पीते उठते बैठते, सोवत सुपन जाग्रत ।.
दम ना छोडे मासूकसों, जाकी असल हक निसबत ।।
इस प्रकार श्री कृष्ण प्रणामी धर्ममें परमात्माको जाननेके लिए तारतम्य ज्ञाान एवं पानेके लिए प्रेम लक्षणा भक्तिका उपदेश दिया गया है ।

 

 

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19 Apr 12

Mohan Sapkota

Aap ki aise sargarvit lekh sadaiba padne our manan karne ki liye milte rahe guru bar. charan kamal may prem pranam.
31 Jan 12

Rasik H Chauhan-Gandhinagar.

Suparb Bahuj Sunder, Purnbhrahm Parmatma ni Jankari nu Varn Bahuj Saaru Karelu 6e..Prem Laxana Bhakti ej Pranami Dharma Ni Dharohar 6e..
15 Jan 12

Dilip Patel

मकरसक्रांतिके अवसरकी शुभकामनाए.
प्रणाम
पुज्य गुरुजी और सब सुंदरसाथजी
14 Jan 12

PRASHANT K BHAVSAR,VADODARA

Pranam Guruji
શ્રી રાજશ્યામાજી દ્વારા અમારા ગુરુજીને હરહંમેશ આ પ્રકારના બ્લોગ પ્રસિધ્ધ કરવાની પ્રેરણા મળતી રહે અને ગુરુજીના આશિર્વાદથી દરેક સુન્દરસાથને રાજજીનો અપાર પ્રેમ મળતો રહે એવી પરમાત્માના ચરણોમા પ્રાર્થના
10 Jan 12

Rabin Kumar Sasanker

सप्रेम प्रणामजी गुरुजी !!
10 Jan 12

Hina Nikam, Navsari

Pranam Guruji
08 Jan 12

Mahesh Rajyaguru

Pranam Guruji,

Great Aritcle by you.
  • Krishnamani Maharaj-Krishna Pranami
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